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कश्मीर समस्या और नेहरुजी की भूमिका

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परसों डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जीवन पर आधारित एक पुस्तक के विमोचन समारोह में श्री अमित शाह ने कहा था कि ‘कश्मीर का मसला अगर सरदार पटेल के पास होता, तो कश्मीर में कोई समस्या ही न होती। लेकिन यह मसला नेहरुजी के हाथ में था और वहीं से समस्या की शुरुआत हुई’। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस ने इस पर आपत्ति जताई थी, लेकिन मेरे जैसे कई लोग इस बात से सहमत हैं कि कश्मीर समस्या नेहरुजी की गलत नीतियों का ही परिणाम है। यह तो हम सभी जानते हैं कि कश्मीर के लिए ही डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी बलिदान हुए और हमें यह भी मालूम है कि धारा 370 को हटाना आवश्यक है। लेकिन वास्तव में कश्मीर समस्या क्यों उत्पन्न हुई? आइये उस घटनाक्रम को समझने का प्रयास करें।

ब्रिटिश भारत और रियासतें
ब्रिटिश राज के दौरान भारत में दो प्रकार की शासन व्यवस्था थी। देश का कुछ हिस्सा अंग्रेजों के सीधे नियंत्रण में था, जिसे ब्रिटिश भारत कहा जाता था। इसका शासन इंग्लैण्ड की संसद के अधीन था। लेकिन इसके अलावा देश में लगभग 570 रियासतें भी थीं। इनके शासक कोई राजा, महाराजा या नवाब आदि होते थे, हालांकि अधिकांश रियासतों में भी वास्तविक सत्ता ब्रिटिश सरकार के हाथों में ही थी। भारत विभाजन का निर्णय हो जाने पर अंग्रेजों ने ब्रिटिश भारत को तो भारत और पाकिस्तान में बाँट दिया, लेकिन रियासतों को यह अधिकार दे दिया गया था कि वे चाहें तो इन दोनों में से किसी डोमिनियन में शामिल हो जाएँ या स्वतंत्र रहें। सरदार पटेल की कुशलता के कारण 15 अगस्त 1947 से पहले ही 500 से ज्यादा रियासतों का भारत में विलय हो गया, लेकिन कुछ रियासतें बाद में शामिल हुईं। जम्मू-कश्मीर की रियासत भी उनमें से एक थी।

जम्मू कश्मीर और अंतर्राष्ट्रीय स्थितियां
जम्मू-कश्मीर रियासत का मामला कई कारणों से बहुत जटिल हो गया था। पाकिस्तान तो चाहता था ही था कि उसे बंटवारे में भारत का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा मिल जाए। जिन्ना ने कश्मीर के महाराजा को मनाने-समझाने-झुकाने के लिए तीन बार अपने प्रतिनिधि को भी श्रीनगर भेजा, लेकिन पाकिस्तान की दाल नहीं गली। दूसरी तरफ अपने स्वार्थों के कारण ब्रिटेन और अमेरिका की नीयत भी यही थी कि कश्मीर पाकिस्तान में मिल जाए। इसका कारण ये था कि द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद भी अमेरिका और रुस के बीच शीत युद्ध (Cold War) जारी था। इसलिए ब्रिटेन और अमेरिका कम्युनिस्ट रुस व चीन के प्रभाव को रोकने के लिए दक्षिण पूर्वी एशिया में किसी न किसी तरह बने रहना चाहते थे। रूस को घेरने की योजना से ब्रिटेन और अमेरिका तुर्की से लेकर पाकिस्तान तक इस्लामी देशों की एक दीवार बनाना चाहते थे और इसलिए ब्रिटेन को लगता था कि मध्य-पूर्व और दक्षिण पूर्वी एशिया में इस्लामी एकता ब्रिटेन के हितों के लिए लाभदायक हो सकती है। इस्लाम के नाम पर बना नया देश पाकिस्तान इस ब्रिटिश-अमेरिकी कूटनीति का एक मजबूत आधार बन सकता था।

इसके अलावा रुस के साथ किसी युद्ध की स्थिति में उन्हें इस इलाके में सैन्य अड्डों की भी जरूरत पड़ने वाली थी। इसलिए वे पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में चटगाँव तथा पश्चिमी पाकिस्तान में कराची बंदरगाह व हवाई अड्डे का उपयोग कर सकते थे। अतः ब्रिटेन पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाने का इच्छुक था। जम्मू-कश्मीर रियासत की सीमा भारत और पाकिस्तान के अलावा चीन, तिब्बत, रूस और अफगानिस्तान से भी मिलती थी। इसलिए ब्रिटेन की इच्छा थी कि जम्मू-कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो जाए। इसी कारण लॉर्ड माउंटबैटन खुद कश्मीर जाकर महाराजा हरिसिंह से मिले और उन्हें पाकिस्तान में विलय के लिए मनाने का प्रयास किया। हालांकि महाराजा के साथ चार दिन बिताने के बावजूद भी उन्हें सफलता नहीं मिल सकी और महाराजा ने उन्हें खाली हाथ लौटा दिया। लेकिन ब्रिटेन ने अभी भी हार नहीं मानी थी। ब्रिटेन ने महाराजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री रामचंद्र काक, जिनकी पत्नी ब्रिटिश थी, को भी अपनी तरफ मिला लिया, ताकि वे कश्मीर के अन्य अंग्रेज अधिकारियों और राजनीतिज्ञों के साथ मिलकर महाराजा पर पाकिस्तान में विलय के लिए दबाव बनाएं।

शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरु
कश्मीर की बहुसंख्यक प्रजा मुसलमान थी और शेख अब्दुल्ला उनके नेता थे। श्रीनगर के पास एक गांव में बुनकरों के परिवार में जन्मे शेख अब्दुल्ला ने 1930 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी की और 1932 में अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर कश्मीर मुस्लिम कांफ्रेंस का गठन किया। सन 1937 में उनकी नेहरुजी से मुलाक़ात हुई और जल्दी ही दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए। मई 1946 में अब्दुल्ला ने कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के खिलाफ विद्रोह कर दिया और उन्हें कश्मीर से बाहर निकालने की मांग के साथ ‘कश्मीर छोड़ो आंदोलन’ शुरू किया। महाराजा ने उन्हें कैद करके जेल में डाल दिया। वे सितंबर 1947 में जेल से रिहा हुए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रजा परिषद जैसे सभी राष्ट्रवादी संगठनों के लोग कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। तत्कालीन संघ-प्रमुख श्री गोलवलकर जी स्वयं 18 अक्तूबर को कश्मीर जाकर महाराजा से मिले और उन्हें कश्मीर का विलय भारत में करने के लिए तैयार कर लिया। अगले दिन दिल्ली लौटकर गोलवलकर जी ने सरदार पटेल को इसकी सूचना भी दे दी। महाराजा कश्मीर रियासत का भारत में विलय करने के लिए तैयार थे, लेकिन नेहरुजी ने उनके सामने एक शर्त रख दी थी। शेख अब्दुल्ला से अपनी दोस्ती के कारण नेहरुजी चाहते थे कि महाराजा हरिसिंह पहले अपना पद छोड़ दें और कश्मीर शेख अब्दुल्ला के हवाले कर दें, उसके बाद कश्मीर का भारत में विलय होगा। स्पष्ट है कि नेहरुजी देश-हित से ज्यादा अपनी व्यक्तिगत दोस्ती को महत्व दे रहे थे। महाराजा को उनकी यह शर्त मंजूर नहीं थी।

उधर माउंटबैटन और जिन्ना की कोशिशें विफल होने के बाद पाकिस्तान ने अब नई चाल चली। उसने कश्मीर पर हमले की योजना बनाई और 22 अक्तूबर को पाकिस्तान ने कश्मीर रियासत पर आक्रमण कर दिया।  आगे पढ़ें…>>



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